खुद से बनती है पोएट्री
खुद से निकलने लगती है
ये बचपन में होता था
जब मै बैठ जाती थी
और अपने उन शब्दों को पहचान जाती थी
जो पोएट्री हैं
बैठ के सोचना नहीं पड़ता था
सिर्फ दिल को कलम देना पड़ता था
और चुटकियों में हो जाती थी पोएट्री
फिर मैं खो गयी
सालों तक खोई रही
खुद को आवाज़ देकर कितनी बार बुलाया
कनपटियों से निकलते हुए दम को कितनी बार सहलाया
पर फिर भी मै खोई रही
सालों साल
कितने ज्यादा साल
आज मुझे अपनी परछाई दिखी
उसने भी मुझे देख लिया
फिर भागने लगी
उसके पैरों से आती छन छन की आवाज़
ये "खोई हुई मै" का संगीत है
जो "कितने ज्यादा" सालों बाद सुनाई दिया है
ये आज फिर से बजेगा
"खोई हुई मैं" में
हेर रोज़
भले ही आवाज कम हो पर बजेगा
आज फिर कुछ लिखा है मैंने
पर सोचा नहीं
खुद से निकलने लगती है
ये बचपन में होता था
जब मै बैठ जाती थी
और अपने उन शब्दों को पहचान जाती थी
जो पोएट्री हैं
बैठ के सोचना नहीं पड़ता था
सिर्फ दिल को कलम देना पड़ता था
और चुटकियों में हो जाती थी पोएट्री
फिर मैं खो गयी
सालों तक खोई रही
खुद को आवाज़ देकर कितनी बार बुलाया
कनपटियों से निकलते हुए दम को कितनी बार सहलाया
पर फिर भी मै खोई रही
सालों साल
कितने ज्यादा साल
आज मुझे अपनी परछाई दिखी
उसने भी मुझे देख लिया
फिर भागने लगी
उसके पैरों से आती छन छन की आवाज़
ये "खोई हुई मै" का संगीत है
जो "कितने ज्यादा" सालों बाद सुनाई दिया है
ये आज फिर से बजेगा
"खोई हुई मैं" में
हेर रोज़
भले ही आवाज कम हो पर बजेगा
आज फिर कुछ लिखा है मैंने
पर सोचा नहीं
खुद से बनती है पोएट्री
ReplyDeleteखुद से निकलने लगती है
ये बचपन में होता था
जब मै बैठ जाती थी
और अपने उन शब्दों को पहचान जाती थी
जो पोएट्री हैं
बैठ के सोचना नहीं पड़ता था
सिर्फ दिल को कलम देना पड़ता था
वो खुद ही स्याही में डुबकी लगा कर
कागज़ पर उछल पड़ता था
और छिटक जाती थी सफ़ेद पन्ने पर नीली पोएट्री
चुटकियों में
फिर मैं खो गयी
सालों तक खोई रही खुद को आवाज़ देकर कितनी बार बुलाया
कनपटियों से निकलते हुए दम को कितनी बार सहलाया
पर फिर भी मै खोई रही
सालों साल
कितने ज्यादा साल
आज मुझे अपनी परछाई दिखी
उसने भी मुझे देख लिया
फिर भागने लगी
उसके पैरों से आती छन छन की आवाज़
ये "खोई हुई मै" का संगीत है
जो "कितने ज्यादा" सालों बाद सुनाई दिया है
ये आज फिर से बजेगा
"खोई हुई मैं" में
हेर रोज़
भले ही आवाज कम हो पर बजेगा
आज फिर कुछ लिखा है मैंने
पर सोचा नहीं