In Jewish mythology, a dybbuk from Hebrew is a malicious or malevolent possessing spirit believed to be the dislocated soul of a dead person.google +
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Thursday, January 31, 2013
Dybbuk
In Jewish mythology, a dybbuk from Hebrew is a malicious or malevolent possessing spirit believed to be the dislocated soul of a dead person.Tuesday, January 29, 2013
Friday, January 25, 2013
खून की बात
ये मेरे शब्द हैं
जिन्हें मैंने बनाया नहीं है
कोई कील ठोक के मजबूत नहीं किया है
ये मेरे खून में बहते हैं
खून का बहाव तेज होता है तो
काग़ज़ पर टपकने लगते हैं
"सच ये मेरे खून में बहते हैं "
मै दर्द पाने के लिए
और खून बहाने के लिए
शरीर का कोई हिस्सा काटती नहीं हूँ
दर्द होता है तो हिस्सा कट जाता है
हिस्सा कट जाता है तो दर्द होता है
और फिर खून टपकने लगता है
खुद ब खुद
कागज़ लाल हो जाता है
कभी नीला भी, और कभी स्याह भी
कागज़ पर रंग तो चढ़ ही जाता है
पर ये रंग बहुत बेतरतीब होता है
शायद ये खून कभी तरतीबी से टपकेगा
पर तब भी
इसमें कोई कील लगाने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी
क्यों की ये खून मेरा है
क्योंकि ये खून "मेरे" शब्दों का है
पर सच कहूँ तो मुझे ये बेतरतीब लाल नीला स्याह खून आज भी बहुत पसंद है
क्यों की ये मेरा है।
जिन्हें मैंने बनाया नहीं है
कोई कील ठोक के मजबूत नहीं किया है
ये मेरे खून में बहते हैं
खून का बहाव तेज होता है तो
काग़ज़ पर टपकने लगते हैं
"सच ये मेरे खून में बहते हैं "
मै दर्द पाने के लिए
और खून बहाने के लिए
शरीर का कोई हिस्सा काटती नहीं हूँ
दर्द होता है तो हिस्सा कट जाता है
हिस्सा कट जाता है तो दर्द होता है
और फिर खून टपकने लगता है
खुद ब खुद
कागज़ लाल हो जाता है
कभी नीला भी, और कभी स्याह भी
कागज़ पर रंग तो चढ़ ही जाता है
पर ये रंग बहुत बेतरतीब होता है
शायद ये खून कभी तरतीबी से टपकेगा
पर तब भी
इसमें कोई कील लगाने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी
क्यों की ये खून मेरा है
क्योंकि ये खून "मेरे" शब्दों का है
पर सच कहूँ तो मुझे ये बेतरतीब लाल नीला स्याह खून आज भी बहुत पसंद है
क्यों की ये मेरा है।
AAJ MAI ROI
http://amritapritamhindi.blogspot.in/2008/06/blog-post_23.html
अमृता तो हीर है,और फकीर भी
mai hamesha se aisa hi pyaar chahti thi apne liye, shayad sab aisa hi chate honge,
per aaj mai royi, maine us aurat ki shiddat ko mahsoos kiya, aur uske chanewaale IMROZ ki shiddat ko bhi mahsoos kiya, aur un dono ke alag alag dard ko bhi mahsoos kiya,
shayad bahut kam, shayad bilkul nahi, per aaj mai royi...
अमृता तो हीर है,और फकीर भी
इमरोज़
अमृता को कई नामों से बुलाते थे उस में एक नाम था "बरकते "बरकते यानी बरकत
वाली अच्छी किस्मत वाली सम्पन्न भरपूर.... वह कहते हैं कि बरकत तो उसके
हाथ में है , उसके लेखन में है ....उसके होने में है ,उसके पूरे वजूद में
है ..अमृता तो हीर है
और फकीर भी
तख्त हजारे उसका धर्म है
और प्यार
उसकी ज़िंदगी
जाति से वह भिक्षु है
और मिजाज़ से
एक अमीर
वह एक हाथ से कमाती है
तो
दूसरे हाथ से बांटती है
इमरोज़ और अमृता के मिजाज़ और पसन्द मिलती जुलती भी है और अलग भी है ! वह दोनों अलग कमरे में रहते थे .अमृता बहुत सवेरे काम करती थी जब इमरोज़ सोये हुए होते थे और इमरोज़ उस वक्त काम करते थे जब अमृता सोयी होती थी .दोनों के जीवन कर्म अलग अलग थे लेकिन स्वभाव एक से थे !न वह पार्टी में जाते थे न घर में इस प्रकार का कोई आयोजन होता था दोनों अपने साथ ही वक्त गुजारना पसंद करते थे, अलग अलग अकेले अपने साथ अमृता अपने लेखन में ,इमरोज़ अपनी पेंटिंग्स में ....दोनों के कमरे के दरवाज़े खुले रहते ताकि एक दूसरे की खुशबु आती रहे लेकिन एक दूसरे के काम में कोई दखल अंदाजी नही ....जब अमृता लिख रही होती तो इमरोज़ चुपचाप उसके कमरे में जा के उनकी मेज पर चाय का कप रख आते !पर जब अमृता के बच्चे कुछ मांगते तो अपना लिखना बीच में छोड़ के वह उनका कहा पूरा करती !
अमृता कवितायें बनाती नही थी वह केवल अपने जज्बात से कविता कागज पर उतार देती एक बार लिखने के बाद न तो उन्हें काटती न कुछ उस में बदलती थी जो जहन में आता वह उसको वैसा ही लिख देती !!
एक बार की बात इमरोज़ जी ने मुझे बताई की वह किसी काम से मुम्बई गए थे ....ख़त आदि का सिलसिला उनके और अमृता के बीच में चलता रहा ..ऐसे ही एक ख़त में अमृता ने उन्हें लिखाजीती !!
तुम जितनी सब्जी दे के गए थे ,वह ख़त्म हो गई है !जितने फल लेकर दे गए थे वह भी ख़त्म हो गए हैं फिरज खाली पड़ा है ..मेरी ज़िंदगी भी खाली होती हुई सी लग रही है - तुम जितनी साँसे छोड़ गए थे ,वह खत्म हो रहीं है ....
दस्तावेज ;अमृता प्रीतम के ख़त ]
इमरोज़ अमृता से कई साल छोटे थे पर कभी उम्र उनके प्यार में नही आई ,दोनों अलग शख्सियत थे पर एक दूजे को दिल से चाहा !! क्या इस लिए कहते हैं कि विपरीत परस्पर एक दुसरे को आकर्षित करते हैं ? क्या प्यार इन्ही दो उलट लोगो के बीच की कशिश होती है !!
वह
हर कोई कह रहा है
कि वह नही रही
मैं कहता हूँ
वह है
कोई सबूत?
मैं हूँ
अगर वह न होती
तो मैं भी न होता ....
इमरोज़
और फकीर भी
तख्त हजारे उसका धर्म है
और प्यार
उसकी ज़िंदगी
जाति से वह भिक्षु है
और मिजाज़ से
एक अमीर
वह एक हाथ से कमाती है
तो
दूसरे हाथ से बांटती है
इमरोज़ और अमृता के मिजाज़ और पसन्द मिलती जुलती भी है और अलग भी है ! वह दोनों अलग कमरे में रहते थे .अमृता बहुत सवेरे काम करती थी जब इमरोज़ सोये हुए होते थे और इमरोज़ उस वक्त काम करते थे जब अमृता सोयी होती थी .दोनों के जीवन कर्म अलग अलग थे लेकिन स्वभाव एक से थे !न वह पार्टी में जाते थे न घर में इस प्रकार का कोई आयोजन होता था दोनों अपने साथ ही वक्त गुजारना पसंद करते थे, अलग अलग अकेले अपने साथ अमृता अपने लेखन में ,इमरोज़ अपनी पेंटिंग्स में ....दोनों के कमरे के दरवाज़े खुले रहते ताकि एक दूसरे की खुशबु आती रहे लेकिन एक दूसरे के काम में कोई दखल अंदाजी नही ....जब अमृता लिख रही होती तो इमरोज़ चुपचाप उसके कमरे में जा के उनकी मेज पर चाय का कप रख आते !पर जब अमृता के बच्चे कुछ मांगते तो अपना लिखना बीच में छोड़ के वह उनका कहा पूरा करती !
अमृता कवितायें बनाती नही थी वह केवल अपने जज्बात से कविता कागज पर उतार देती एक बार लिखने के बाद न तो उन्हें काटती न कुछ उस में बदलती थी जो जहन में आता वह उसको वैसा ही लिख देती !!
एक बार की बात इमरोज़ जी ने मुझे बताई की वह किसी काम से मुम्बई गए थे ....ख़त आदि का सिलसिला उनके और अमृता के बीच में चलता रहा ..ऐसे ही एक ख़त में अमृता ने उन्हें लिखाजीती !!
तुम जितनी सब्जी दे के गए थे ,वह ख़त्म हो गई है !जितने फल लेकर दे गए थे वह भी ख़त्म हो गए हैं फिरज खाली पड़ा है ..मेरी ज़िंदगी भी खाली होती हुई सी लग रही है - तुम जितनी साँसे छोड़ गए थे ,वह खत्म हो रहीं है ....
दस्तावेज ;अमृता प्रीतम के ख़त ]
इमरोज़ अमृता से कई साल छोटे थे पर कभी उम्र उनके प्यार में नही आई ,दोनों अलग शख्सियत थे पर एक दूजे को दिल से चाहा !! क्या इस लिए कहते हैं कि विपरीत परस्पर एक दुसरे को आकर्षित करते हैं ? क्या प्यार इन्ही दो उलट लोगो के बीच की कशिश होती है !!
वह
हर कोई कह रहा है
कि वह नही रही
मैं कहता हूँ
वह है
कोई सबूत?
मैं हूँ
अगर वह न होती
तो मैं भी न होता ....
इमरोज़
mai hamesha se aisa hi pyaar chahti thi apne liye, shayad sab aisa hi chate honge,
per aaj mai royi, maine us aurat ki shiddat ko mahsoos kiya, aur uske chanewaale IMROZ ki shiddat ko bhi mahsoos kiya, aur un dono ke alag alag dard ko bhi mahsoos kiya,
shayad bahut kam, shayad bilkul nahi, per aaj mai royi...
Tuesday, January 22, 2013
Saturday, January 5, 2013
Vibhu Puri Sau Gram Zindagi
Movie: Guzaarish
Song Name: Sau Gram Zindagi lyrics
Singers: Kunal Ganjawala
Lyrics: Vibhu Puri
Music Director: Sanjay Leela Bhansali
thodi si meethi hai zara si mirchi hai
sau gram zindagi yeh sambhaal ke kharchi hai
asli hai, jhooti hai khaalish hai, farzi hai
sau gram zindagi yeh sau gram zindagi yeh
sambhaal ke kharchi hai thodi si meethi hai
zara si mirchi hai
der tak ubaali hai cup mein daali hai
kadvi hai naseeb si yeh coffee gaadhi gaadhi hai
chamach bhar cheeni ho itni si marzi hai
sau gram zindagi yeh sau gram zindagi yeh
sambhaal ke kharchi hai
khari hai, khoti hai rone ko chhoti hai
dhaagey se khushiyon ko seelti hai, darzi hai
sau gram zindagi yeh sau gram zindagi yeh
sambhaal ke kharchi hai thodi si meethi hai
zara si mirchi hai
life is good life is wonderful
life is pain oh yeah yeah yeah
life is good, life is good
life is wonderful, wonderful
life is pain it all part of that game
life is love it all good that' s the way
sau gram zindagi yeh - 4
देखो भाषा तो एक ही है, और सीमित
उसमे ही विचरण करना है
उसमे ही घूमते रहना है
उसमे से ही कुछ पत्तियां तोड़ के लानी है
ये पत्तियां हरी भी हो सकती हैं
और पीली भी
और ये पत्तियां सूखी भी हो सकती हैं
बात सिर्फ इतनी सी है
कि तुम्हे इन पत्तियों में ही
थोड़ी सी अपनी महक मिलनी है ..............................
उसमे ही विचरण करना है
उसमे ही घूमते रहना है
उसमे से ही कुछ पत्तियां तोड़ के लानी है
ये पत्तियां हरी भी हो सकती हैं
और पीली भी
और ये पत्तियां सूखी भी हो सकती हैं
बात सिर्फ इतनी सी है
कि तुम्हे इन पत्तियों में ही
थोड़ी सी अपनी महक मिलनी है ..............................
रूम मेट
मुझे अच्छा लगा आज तुम्हे चहकता देख कर
तुम पहले जैसी दिख रही हो।।
मै जानती हूँ कि अन्दर बहुत दर्द है
और शायद मैं उसे समझती भी हूँ
पर मै उसे नासमझने का दिखावा करती हूँ
और मै ये दिखावा करती रहूंगी
क्यों कि मै बहुत मतलबी हूँ
मुझे पता है की पिछली बार जब तुम्हे चोट लगी थी
तो मुझे बहुत दर्द हुआ था
तुम्हारा घाव भर गया था, लेकिन मै करहाती रही
तुम नाली में जा गिरी थीं
तुम्हारा पूरा शरीर छिल गया था।।
तुम बच्चों सी ज़िद करके मेरे मना करने बावजूद
हम सबके मना करने के बावजूद
फिर उसी नाली के पास जा रही हो
क्यों की उस नाली में तुम्हे अपनी तैरती हुई नाव
बहुत ख़ूबसूरत दिखाई देती है
तुम समझ नहीं पा रही हो कि नाव कागज़ की है
कुछ दूर चलने के बाद गल जाएगी
और नाली में बहुत फिसलन है
तुम नाव के पीछे भागते भागते फिर गिर जाओगी
और फिर चोट लगेगी तुम्हे तुम्हारे शरीर पर
तुम्हारे मन पर भी
शायद मेरे मन पर भी
इसलिए बार - बार मै खुद से कहती रहती हूँ
कि तुम्हारे दर्द से मेरा कोई रिश्ता नहीं
क्योंकि मै बहुत मतलबी हूँ ।।।।।
तुम्हारी याद में
तुम्हारे अन्दर से कितनी कहानियां निकलती हैं हर रोज़,
पर मै उन्हें लिख नहीं पाती।
क्यों की लिखते- लिखते कलम गीली हो जाती है और स्याही बहने लगती है
आज सुबह से मैंने कितनी कोशिश की कि इस बहती हुई स्याही को
तुम्हारी सफ़ेद शर्ट तक पहुँचने न दूँ
तुम्हारी सफ़ेद शर्ट तक पहुँचने न दूँ
पर ये बहुत ज़िद्दी है
मेरी उँगलियों को काला करते हुए अपना रास्ता बना कर निकल गयी
और मै यहाँ तुम्हारी शर्ट पर लगे दाग को देख कर पछता रही हूँ!!!
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