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Saturday, August 15, 2015

सपना अभी भी -

एक अकेलेपन से दूसरे अकेलेपन
 में पहुँचते हुए मैं हर बार प्यार में से गुज़रा हूँ

एक गहरा छायादार रास्ता धीरे धीरे रेगिस्तान की पगडण्डी
में बदलता हुआ जिस पर आगे बढ़ना मुश्किल है, पीछे लौटना
असंभव, वो रास्ता जो हर रात मेरे सपने में से गुजरता
हुआ सुबह की पराजित ऊब में फिर उठ खड़ा होता है चलने के लिए

लेकिन कहाँ

सब कुछ है यहाँ - वही नम कांपते होंठो पर भटकती उंगलियां
और अस्फुट फूटते शब्द
और टूटते सांसो की गरम आंच और ये अहसास'
कि दरवाज़े के बहार छोड़ आया था जिसे,
खिड़की से झाँकने लगा है वही अकेलापन

कि प्यार सिर्फ इक टूटती गिरी ईमारत में खड़ा
एक साबित द्वार है जिसे धड़कते दिल से खोलकर हम सूनेपन से 
सूनेपन में पहुँचते हैं.


धर्मवीर भारती