बारिश की वो रिमझिम बौछारें
बदल गयी मेरा कल्पना में
मन की आशाएं मन को विभोर कर रही थीं
बूंदें चरों और टप - टप का शोर कर रही थीं
हवा ने माँ का आँचल लपेट दिया मेरे तन से
ममता की सिहरन कुछ कह रही थी मन से
ऐसा लगा जीवन तो मिला साथ में चाह मिल गयी
आज तक तरस रही थी जिसको वो प्यारी माँ मिल गयी
किताबों का तजुर्बा था उसे आज जाना है मैंने
माँ का प्यार क्या होता है उसे आज पहचाना है मैंने
जन्मों जन्मों तक इस जननी की पूजा करुँगी
अगर वो सात जन्मों तक मेरी मान रहेगी
अचानक पेड़ की एक टहनी टूट कर गिर गयी
मेरा ध्यान माँ की ओर से भंग कर गयी
कल्पना से मैं वास्तविकता में आ गयी
बारिश की बूंदों में खुद को पा गयी
13- 14 saal bit gaye jab ye likhi..
.abhi sab ikattha kar rahi hUn ek jagah isliye post kar di...
per ye chronology nahi hai iske post ki..
No comments:
Post a Comment