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Sunday, December 23, 2012

सैलरी

मेरे दिमाग में हर रोज नए ideas आते रहते हैं ..........बेहतरीन और innovative लेकिन मै उन्हें हकीक़त का लिबास नहीं पहना सकता, पैसा कहाँ है......
मेरी सूरत देख रहे हैं आप !!!!!
पहले  ये इतनी बदसूरत और बदमिजाज़ नहीं थी .....पहली बार में लोगों को करीब, और करीब लाने का हुनर आता था इसे,  पर अब करीब आना तो दूर,  दूर जाने का सिलसिला यूँ बढ़ता जा रहा है कि अताम्विश्वास कि सीढ़ी के  एक एक डंडे नीचे से टूटते जाते हैं......... मै उठा  था पहले, पर अब गिर रहा हूँ.......
सपने, महत्वाकंछायें , जस्बा, मेहनत और सरलता को सान के नीव रखी थी इरादों की .........पर एक विशेष नस्ल के दीमक ने इसे कब खोखला कर दिया भनक ही न पड़ी.......समय के साथ - साथ सपने भी फुसफुसाते गए, इसलिए नहीं कि मेरे अंदर इन्हें पूरा करने का माददा नही था बल्कि इसलिए कि ये टाइम ले रहे थे और टाइम के साथ इनकी relevancy ख़तम होती जा रही थी..
कल जिन लोगों पर अट्टहास करती था मै, सोचता था कि गलतियों का पुलिंदा हैं वो सब आज उन पुलिंदे कि एक छोटी सी चिप बन के रह गया हूँ मै....
तमाम जिंदगियों के उलझे  हुए धागों के सिरे दिख तो रहे हैं, पर उन्हें पकडू कहाँ से ये अंदाज़ा नहीं लग पा रहा है,,,
आप सोच रहे होंगे कि मै कितनी negative बातें कर रहा हूँ...."क्या दिन भर कि थकान के बाद हम यही उक्ताऊ बातें सुनने आये हैं " तो खैर मै आपको बता दूँ कि अभी भी थोड़ी सी positivity बाकी है मुझमे......इसलिए मै आपकी तकलीफ  और बेबसी को और नहीं बढ़ाऊंगा.....मतलब आपको और और जादा bore नहीं करूँगा..
"SALARY"  ये शब्द चमकदार है...जिसकी लिए आप यहाँ आये भी हैं.....तो आगे का फार्मा इसी शब्द के साथ.....

लेकन हाँ एक छोटी सी request  है आप सब से ,,,,,,,भले ही आप SALARY के लालच में आये हैं......पर जब आप अनावश्यक रूप से मुझसे  मिल ही लिए हैं तो इंसानियत के नाते मेरा एक काम कर दीजिये........बस एक बार कोशिश कर के मुझे   तालश कर मुझे सौंप दीजिये.......मै तो थक गया हूँ कोई सिरा पकड़ में ही नहीं आता अपनी पहचान का...........



अंकिता गुप्ता 
(कुछ साल पह्ले)

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