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Saturday, December 22, 2012


 Thota Rennovation




खुद से बनती  है पोएट्री
 खुद से निकलने लगती है
ये बचपन में होता था
जब मै बैठ जाती थी
और अपने उन शब्दों को पहचान जाती थी
जो पोएट्री हैं
बैठ के सोचना नहीं पड़ता था
सिर्फ दिल को कलम देना पड़ता था
और दिल खुद ही स्याही में दुबकी लगा
कागज़ पर उछल कर कूद पड़ता था
और चुटकियों में हो जाती थी पोएट्री

फिर मैं खो गयी
सालों तक खोई रही
 खुद को आवाज़ देकर कितनी बार बुलाया
कनपटियों से निकलते हुए दम को कितनी बार सहलाया

पर फिर भी मै खोई  रही
सालों साल
कितने ज्यादा साल

आज मुझे अपनी  परछाई  दिखी
उसने भी मुझे  देख लिया
फिर भागने लगी
उसके पैरों से आती छन  छन  की आवाज़


ये "खोई हुई मै" का संगीत है
जो "कितने ज्यादा" सालों बाद सुनाई दिया है 
ये आज फिर से बजेगा
"खोई हुई मैं" में
हेर रोज़
भले ही आवाज कम हो पर बजेगा

आज फिर कुछ लिखा है मैंने
पर सोचा नहीं

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