google +

Search results

Monday, June 24, 2013

कुछ दिनों से ससून के बाहर ।

चप्पलों से उछलती हुई बारिश की कीचड में सनी जिंदगी,
सरकारी अस्पताल की थूक से सनी दीवार के सहारे चुपचाप खड़ी बीडी फूँक रही है।

मेरी जिंदगी बिन बैग मे धंसी  मार्लबोरो पी रही है।


Tuesday, June 11, 2013

......................




एक याद कंडे कोठे की 

पैनी ऊबाई



शुक्र है कि ये तेज़ चाकू इंसानों में और गैर इंसानों में फर्क करना जानता है,
इसकी तसल्ली सिर्फ भीड़ में जगमगाते हुए चमकदार, गैर चमकदार,
 काले -सफ़ेद नीले-और हरे चेहरों को छील कर गूदेदार सच्चाई जान ने में होती है,
 बाकि ये खुश रहता है अपनी ऊबाई के साथ,
 और इतना तेज़ होने के बावजूद अपनी नोक को इन गूदेदार सुर्ख़ियों से बचाता फिरता है,
 ये चाकू मेरा है जिसका शौक सिर्फ मुझे चीरना है।


(इसके जवाब में )
"खुद से ऊब जाना एक तेज़ चाकू है...
जिसे लिये मैं एक भीड़ में घूम रहा हूँ |" 

                         - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना