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Friday, December 28, 2012

आज   फिर  मैंने पैसे खर्च किये।।
पर आज बहुत तकलीफ हुई।।।।
 आज तुमने कहा कि तुम नासूर हो।।।।
तब भी तो हमने तुमसे प्यार करना कम नहीं किया।।।।
 ग़र  तीर ताना है शिद्दत  से ...............

   तो मार दो उसे ...............
हर आदमी दूसरे आदमी जैसा है।
और वो सब एक दूसरे से जलते हैं।।
  सबसे बुरी  बात  ये  है  कि मै अपने अन्दर
   हर बात को महसूस  पाती हूँ।
  मै खुद  को महसूस कर  पाती हूँ।।।



Sunday, December 23, 2012

मुझे उससे प्यार है


मुझे प्यार है उससे
उसकी अजीब सी हरकतों से
उसका बेवजह दाढ़ी बढ़ाना
फिर अजीब तरह से खुजलाना
किसी  के कहने पर भी
अपनी जिद में दाढ़ी न कटवाना
उसकी वो बच्चों जैसी  स्वीट मुस्कान
उसकी बॉडी लैंग्वेज
उसका ये कहना की मै बहुत सात्विक हूँ
जबकि उसकी निगाओं का उन्चाहे ही
लड़कियों के क्लीवेज  पर टिक जाना
इंसान है बहुत सोचता है
पर सच में बहुत स्टुपिड है
इतनी सारी किताबें पढता है
और इससे पहले इतनी साड़ी पढ़ चुका है
उसकी शादी तो बड़ी सी
चार फुट पञ्च इंच की किताब से होनी  चाहिए
वो उसको बीवी का प्यार भी देगी
और ज़िन्दगी भी संवार देगी

लेकिन तब मेरा क्या होगा????

मै खुद

ना जाने कितनो के साथ सोयी उस दिन के बाद
न उस दिन चिल्लाई थी ना फिर कभी और
फिर तो मेरे आसमान का रंग ही बदल गया

उनके लिए आसमान नीला  है हमारे लिए गन्दला
उनके मुंह में जबान नहीं होती,
और हमारी कैंची की तरह चलती है

खामोश दरिन्दे हैं हर दिन लूटने चले आते हैं
चार आयताकार कागज़ के टुकड़ों के साथ
मरे हुई पुर्चियों  से जिंदा शरीर खरीदते है
पलंग पर शोर मचाते हैं  फिर ख़ामोशी से निकल जाते हैं

लबादा

अब समय आ गया है की  मै अपने दुखों के पुराने - चीथड़े लबादे में पाबंद लगाना बंद करूँ और उसे उतार फेंकूं
और उसकी छोटी से छोटी तह बनाकर थोड़ी मिट्टी खोद कर उसे दफना दूँ। क्यों की मै नही चाहती की तुमसे निकलने वाली धूप की कोई भी लपट
इस लबादे के छेद से या फटी हुई सीवन से अन्दर घुस कर मुझे जला  दे।।। क्यों की अब मै तुमसे जलना नहीं चाहती।।

लेकिन उससे पहले मै तुम्हे एक बार ये लबादा दिखाना चाहती हूँ, और तुम्हे ये बताना चाहती हूँ कि देखो इस लबादे को उतार फेंकना इतना आसन नहीं था
क्यों की ये हमेशा से चीथड़ा नहीं था, ये मजबूत और न फटने वाले दुखों के कपडे से बना था, और ना टूटने वाले यादों के धागे से सिला था,
जिसे चीथड़ा बनाने में सालों लिए हैं मैंने, या यूँ कहो की सालों दिए है मैंने, पर खैर दफ़्नाऊन ना अगर इसे तो आखिरी ख्वाहिश है की तुम्हे पहना दूँ ये लबादा
और चारों तरफ से सुलगा दूँ आग जो तुम्हारे सूरज से ज्यादा हो।।।।।।।।।।।।।



March15/ 2010
 



माँ


बारिश की वो रिमझिम बौछारें
बदल गयी मेरा कल्पना में
मन की आशाएं मन को विभोर कर रही थीं
बूंदें चरों और टप - टप का शोर कर रही थीं
 

हवा ने माँ  का आँचल लपेट दिया मेरे तन से
 ममता की सिहरन कुछ कह रही थी मन से
ऐसा लगा जीवन तो मिला साथ में चाह  मिल गयी
आज तक तरस रही थी जिसको वो प्यारी माँ मिल गयी

किताबों का तजुर्बा था उसे आज जाना है मैंने
माँ का प्यार क्या होता है उसे आज पहचाना है मैंने
जन्मों जन्मों तक इस जननी की पूजा करुँगी
अगर वो सात जन्मों तक मेरी मान रहेगी

अचानक पेड़ की एक टहनी टूट कर गिर गयी
मेरा ध्यान माँ की ओर से भंग कर गयी
कल्पना से मैं वास्तविकता में आ गयी
बारिश की बूंदों में खुद को पा  गयी


 
13- 14 saal bit gaye jab ye likhi..
.abhi sab ikattha kar rahi hUn ek jagah isliye post kar di...
per ye chronology nahi hai iske post ki..

सैलरी

मेरे दिमाग में हर रोज नए ideas आते रहते हैं ..........बेहतरीन और innovative लेकिन मै उन्हें हकीक़त का लिबास नहीं पहना सकता, पैसा कहाँ है......
मेरी सूरत देख रहे हैं आप !!!!!
पहले  ये इतनी बदसूरत और बदमिजाज़ नहीं थी .....पहली बार में लोगों को करीब, और करीब लाने का हुनर आता था इसे,  पर अब करीब आना तो दूर,  दूर जाने का सिलसिला यूँ बढ़ता जा रहा है कि अताम्विश्वास कि सीढ़ी के  एक एक डंडे नीचे से टूटते जाते हैं......... मै उठा  था पहले, पर अब गिर रहा हूँ.......
सपने, महत्वाकंछायें , जस्बा, मेहनत और सरलता को सान के नीव रखी थी इरादों की .........पर एक विशेष नस्ल के दीमक ने इसे कब खोखला कर दिया भनक ही न पड़ी.......समय के साथ - साथ सपने भी फुसफुसाते गए, इसलिए नहीं कि मेरे अंदर इन्हें पूरा करने का माददा नही था बल्कि इसलिए कि ये टाइम ले रहे थे और टाइम के साथ इनकी relevancy ख़तम होती जा रही थी..
कल जिन लोगों पर अट्टहास करती था मै, सोचता था कि गलतियों का पुलिंदा हैं वो सब आज उन पुलिंदे कि एक छोटी सी चिप बन के रह गया हूँ मै....
तमाम जिंदगियों के उलझे  हुए धागों के सिरे दिख तो रहे हैं, पर उन्हें पकडू कहाँ से ये अंदाज़ा नहीं लग पा रहा है,,,
आप सोच रहे होंगे कि मै कितनी negative बातें कर रहा हूँ...."क्या दिन भर कि थकान के बाद हम यही उक्ताऊ बातें सुनने आये हैं " तो खैर मै आपको बता दूँ कि अभी भी थोड़ी सी positivity बाकी है मुझमे......इसलिए मै आपकी तकलीफ  और बेबसी को और नहीं बढ़ाऊंगा.....मतलब आपको और और जादा bore नहीं करूँगा..
"SALARY"  ये शब्द चमकदार है...जिसकी लिए आप यहाँ आये भी हैं.....तो आगे का फार्मा इसी शब्द के साथ.....

लेकन हाँ एक छोटी सी request  है आप सब से ,,,,,,,भले ही आप SALARY के लालच में आये हैं......पर जब आप अनावश्यक रूप से मुझसे  मिल ही लिए हैं तो इंसानियत के नाते मेरा एक काम कर दीजिये........बस एक बार कोशिश कर के मुझे   तालश कर मुझे सौंप दीजिये.......मै तो थक गया हूँ कोई सिरा पकड़ में ही नहीं आता अपनी पहचान का...........



अंकिता गुप्ता 
(कुछ साल पह्ले)

ये मै हूँ


तुम्हारी बातें किसी मंझे हुए लेखक की तरह हैं, जो की किसी निहायत ही भोले और मासूम इंसान के जज्बातों के अंदर घुस के उसके अंदर के षड़यंत्र को भी निकाल लेता है.....जबकि हम जानते हैं की मासूमियत षड्यंत्रकारी नहीं होती...

इतनी आसानी से कैसे निकल आती हो



कभी भी निकल आती हो तुम तो
सोता खोद के
कभी लाल हो, कभी हरी,
कभी सफ़ेद और कभी काली
धारे से निकल आती हो
ऐसे कैसे निकल आती हो
इतनी आसानी से कैसे निकल आती  हो??
 !!तुम  कविता!!


ये भी तुम्हारे लिए।।। और तुम जानते हो कि तुम कौन हो


हर कोशिश बेकार कर दी है तुमने
उम्मीदें दरिया के पार कर दी हैं तुमने
ये दूर वो दूर
सूत का एक धागा था
उस धागे के हर रेशे तार तार कर दीं हैं तुमने

पानी भरा है दिल में
या पनी में दिल उतर गया
आँखों  का रस्ता ढूंढे
खुशियाँ ज़ार ज़ार कर दी हैं तुमने।।


आज मै रोये जा रही हूँ 


तुम्हारे लिए कहा है ये

बहुत कुछ लिखना है . .......... मगर

खून उछल के पानी पर गिरने तो दो
सारी  नदी खुद ब खुद लाल हो जाएगी ........


 To A

इतनी याद तुम्हारी आई
कि याद याद को भूल गयी।

Saturday, December 22, 2012


 Thota Rennovation




खुद से बनती  है पोएट्री
 खुद से निकलने लगती है
ये बचपन में होता था
जब मै बैठ जाती थी
और अपने उन शब्दों को पहचान जाती थी
जो पोएट्री हैं
बैठ के सोचना नहीं पड़ता था
सिर्फ दिल को कलम देना पड़ता था
और दिल खुद ही स्याही में दुबकी लगा
कागज़ पर उछल कर कूद पड़ता था
और चुटकियों में हो जाती थी पोएट्री

फिर मैं खो गयी
सालों तक खोई रही
 खुद को आवाज़ देकर कितनी बार बुलाया
कनपटियों से निकलते हुए दम को कितनी बार सहलाया

पर फिर भी मै खोई  रही
सालों साल
कितने ज्यादा साल

आज मुझे अपनी  परछाई  दिखी
उसने भी मुझे  देख लिया
फिर भागने लगी
उसके पैरों से आती छन  छन  की आवाज़


ये "खोई हुई मै" का संगीत है
जो "कितने ज्यादा" सालों बाद सुनाई दिया है 
ये आज फिर से बजेगा
"खोई हुई मैं" में
हेर रोज़
भले ही आवाज कम हो पर बजेगा

आज फिर कुछ लिखा है मैंने
पर सोचा नहीं

Friday, December 21, 2012

फिर लखनऊ में भी एक चाहिए 
और  यहाँ भी एक चाहिए 
इतने एक मिल गए 
तो इन एक सौ ग्यारह को सम्भालुंगी कैसे ? 
अगर बढावा ही देना होता
तो मै दुनिया के हर उस इंसान को देती
जो मेरे पास आता 
और   मेरे साथ सोना चाहता

जो हुआ सो हुआ


इस बात को कभी भूलियेगा मत
कि आप रोते हुए मेरे पास आये थे
क्यों की मै भी कभी नहीं भूलती

और इस बात को भी
कि आपने मुझे रोता हुआ छोड़ दिया था

क्यों  कि मै भी कभी नहीं भूलती
तुम हमेशा मेरे साथ ही रहोगे
और वो बेचारा
कहीं और पूरा करेगा अपना अधूरापन
किसी ने मुझसे पुछा की की मुझे अपनी ज़िन्दगी में
guilt किस बात का है
तो मैं उन्हें बता न सकी
और जो बताया भी वो सच नहीं था

पर अगर वो आज ये पूछें की अफ़सोस किस बात का है
तो मै  कहूँगी कि

आज तक
बशीर बद्र साहब को क्यों नहीं पढ़ा मैंने  .....................

मै खुद

किसी ने मुझसे पुछा की की मुझे अपनी ज़िन्दगी में
guilt किस बात का है
तो मैं उन्हें बता न सकी
और जो बताया भी वो सच नहीं था

पर अगर वो आज ये पूछें की अफ़सोस किस बात का है
तो maiकहूँगी की आज तक
बशीर बद्र साहब को क्यों नहीं पढ़ा .....................मैं खुद

Thursday, December 20, 2012

You have come again

The cup and the plate are waiting for me
and your mother is waiting for the rituals to be done
 But what I am waiting for??
 Is it you?? Is it really you??
Oh! yes Its you, A grown up man
In a white matriculated shirt
For what I have waited a long


And then you gone to the mountains once
and you called me from there
and you called for the reason


The reason you got Her

And then you got Him too


And the winters kept coming every year
And you kept going to the mountains every year
And he kept growing in the mountains every year

He was growing with Her
more than that he was growing with you


Because you left him alone


You left him alone In the snowy mountains
In the HazyMountains
In the green mountains
In the happy Mountains


He will pursue the journey again
He will reach the destination again
He will serve the purpose again


And YOU will reflect again
In Him
With Him
In Everywhere


And I will be watching you again
 from Everywhere





Wednesday, December 19, 2012

Mummy

ये कहानी मौसी की 
या ये कहानी मेरी मम्मी की 
एक पति होना, दो तीन बच्चे होना 
दिन में काम करना 
रात में काम करना 
और आराम से रहना 
या आराम से न रहना 
क्या ये पूरी बात है 

कभी- कभी ये दोनों पागलों की तरह बडबडाते भी तो हैं
कभी- कभी ये दोनों अपने कनपटियों को सहलाते भी तो हैं

कुर्सी ही तो मांगी थी टी वी देखने के लिए उन्होंने
और मैंने रानी महारनी कहकर छीन ली ...

Monday, December 10, 2012

ये बदला है या नहीं    पता नहीं
पर जो हो वो तुम हो
 मेरा मुक्कमल भी तुम हो
जो है "रिसता" वो भी तुम हो
शैतान भी तुम हो
फ़रिश्ता भी तुम हो
खुद से बनती  है पोएट्री
 खुद से निकलने लगती है
ये बचपन में होता था
जब मै बैठ जाती थी
और अपने उन शब्दों को पहचान जाती थी
जो पोएट्री हैं
बैठ के सोचना नहीं पड़ता था
सिर्फ दिल को कलम देना पड़ता था
और चुटकियों में हो जाती थी पोएट्री

फिर मैं खो गयी
सालों तक खोई रही
 खुद को आवाज़ देकर कितनी बार बुलाया
कनपटियों से निकलते हुए दम को कितनी बार सहलाया

पर फिर भी मै खोई  रही
सालों साल
कितने ज्यादा साल

आज मुझे अपनी  परछाई  दिखी
उसने भी मुझे  देख लिया
फिर भागने लगी
उसके पैरों से आती छन  छन  की आवाज़


ये "खोई हुई मै" का संगीत है
जो "कितने ज्यादा" सालों बाद सुनाई दिया है 
ये आज फिर से बजेगा
"खोई हुई मैं" में
हेर रोज़
भले ही आवाज कम हो पर बजेगा




आज फिर कुछ लिखा है मैंने
पर सोचा नहीं

Sunday, December 9, 2012

बड बड करते लफ़्ज़ों को चिमटी से पकड़ो
फेंको और मसल दो पैर की एड़ी से
अफवाहों को खून पीने की आदत है

गुलज़ार
 बटनों सी बिंदी
कमानों सा काजल
होंठों की संकरी खाई से निकलता धुआं

चौन्ध्नी सी लौ आँखों के घर में
रुई के फाहों सी मुलायमियत एडियों के गोलों  में

सब कुछ तो है तुम्हारे पास
फिर  भी तो मै  तुमसे प्यार नहीं करता


issse pahle raat mere ghar chhapa maare
maiN tanhaai taale me band kar aata huN
"garbara" naachta hun phir ghumti sadkoN per..

Gulzaar...........

Sunday, December 2, 2012



नहीं हूँ मै कमज़ोर  
मै खो गयी थी 
पर अब वापस लौट आई हूँ 
अपने अंदर और बाहर 
जो मैं हूँ 
वो मै  हूँ  
और मेरे आस पास 
मेरे चारों तरफ भी मै ही हूँ 
मेरा पहला, मेरा दूसरा 
और मेरा आखिरी प्यार भी मै  ही हूँ 
बस मै ..............