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Monday, December 10, 2012

खुद से बनती  है पोएट्री
 खुद से निकलने लगती है
ये बचपन में होता था
जब मै बैठ जाती थी
और अपने उन शब्दों को पहचान जाती थी
जो पोएट्री हैं
बैठ के सोचना नहीं पड़ता था
सिर्फ दिल को कलम देना पड़ता था
और चुटकियों में हो जाती थी पोएट्री

फिर मैं खो गयी
सालों तक खोई रही
 खुद को आवाज़ देकर कितनी बार बुलाया
कनपटियों से निकलते हुए दम को कितनी बार सहलाया

पर फिर भी मै खोई  रही
सालों साल
कितने ज्यादा साल

आज मुझे अपनी  परछाई  दिखी
उसने भी मुझे  देख लिया
फिर भागने लगी
उसके पैरों से आती छन  छन  की आवाज़


ये "खोई हुई मै" का संगीत है
जो "कितने ज्यादा" सालों बाद सुनाई दिया है 
ये आज फिर से बजेगा
"खोई हुई मैं" में
हेर रोज़
भले ही आवाज कम हो पर बजेगा




आज फिर कुछ लिखा है मैंने
पर सोचा नहीं

1 comment:

  1. खुद से बनती है पोएट्री
    खुद से निकलने लगती है
    ये बचपन में होता था
    जब मै बैठ जाती थी
    और अपने उन शब्दों को पहचान जाती थी
    जो पोएट्री हैं
    बैठ के सोचना नहीं पड़ता था
    सिर्फ दिल को कलम देना पड़ता था
    वो खुद ही स्याही में डुबकी लगा कर
    कागज़ पर उछल पड़ता था
    और छिटक जाती थी सफ़ेद पन्ने पर नीली पोएट्री
    चुटकियों में
    फिर मैं खो गयी
    सालों तक खोई रही खुद को आवाज़ देकर कितनी बार बुलाया
    कनपटियों से निकलते हुए दम को कितनी बार सहलाया

    पर फिर भी मै खोई रही
    सालों साल
    कितने ज्यादा साल

    आज मुझे अपनी परछाई दिखी
    उसने भी मुझे देख लिया
    फिर भागने लगी
    उसके पैरों से आती छन छन की आवाज़

    ये "खोई हुई मै" का संगीत है
    जो "कितने ज्यादा" सालों बाद सुनाई दिया है
    ये आज फिर से बजेगा
    "खोई हुई मैं" में
    हेर रोज़
    भले ही आवाज कम हो पर बजेगा

    आज फिर कुछ लिखा है मैंने
    पर सोचा नहीं

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