google +

Search results

Tuesday, July 2, 2013

तुम्हारी याद में

हर बार मरती हूँ तुमसे बात करने से पहले पर सांस की कुछ घूंटो के लिए मरना जरूरी भी है। 

ये जब कि तुमने मुझे छोड़ दिया, दो साल पहले ये जब कि हर बार फ़ोन करने पर तुम भीड़ का बहाना बनाकर यूँही फ़ोन काट देते हो।ये जब कि कि  हर बार ये सोच कर मै घबरा जाती हूँ कि तुम्हारे सामने फिर अपनी इज्जत के कपड़े उतर दिए मैंने।और ये जब कि  हर बार नंगे खड़े हुए मुझे इस बात का अहसास होता है कि मै तुमसे प्यार करती हूँ। और ये जब कि  मुझे अहसास होता है कि मैं एक लड़की हूँ।।
और ये तब की जब तुम इस  "जब"  की गहराई को  समझ ही नहीं पाओगे कभी, क्यों की तुम इस लायक ही नहीं हो।और ये तब की जब तुम अपनी बीवी को अपनी X - गर्लफ्रेंड के दिए हुए टेडी बिअर से बहलाते रहो, और मै खुश होती रहूँ ये देख के कि तुम्हारी जिंदगी कितनी फर्जी है।


Monday, June 24, 2013

कुछ दिनों से ससून के बाहर ।

चप्पलों से उछलती हुई बारिश की कीचड में सनी जिंदगी,
सरकारी अस्पताल की थूक से सनी दीवार के सहारे चुपचाप खड़ी बीडी फूँक रही है।

मेरी जिंदगी बिन बैग मे धंसी  मार्लबोरो पी रही है।


Tuesday, June 11, 2013

......................




एक याद कंडे कोठे की 

पैनी ऊबाई



शुक्र है कि ये तेज़ चाकू इंसानों में और गैर इंसानों में फर्क करना जानता है,
इसकी तसल्ली सिर्फ भीड़ में जगमगाते हुए चमकदार, गैर चमकदार,
 काले -सफ़ेद नीले-और हरे चेहरों को छील कर गूदेदार सच्चाई जान ने में होती है,
 बाकि ये खुश रहता है अपनी ऊबाई के साथ,
 और इतना तेज़ होने के बावजूद अपनी नोक को इन गूदेदार सुर्ख़ियों से बचाता फिरता है,
 ये चाकू मेरा है जिसका शौक सिर्फ मुझे चीरना है।


(इसके जवाब में )
"खुद से ऊब जाना एक तेज़ चाकू है...
जिसे लिये मैं एक भीड़ में घूम रहा हूँ |" 

                         - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 

Monday, May 13, 2013

तुम्हारी मजबूरियां समझने के बाद,
 मैंने आँखें बंद कर लीं और बिस्तर पर जाकर लेट गयी। 

Tuesday, May 7, 2013

माँ तुम्हे समझने के बाद














माँ ने तिनके चुन- चुन के घोंसला  बनाया था जब  हम पैदा नहीं हुए थे तब,
फिर उस घोंसले में ही हम पैदा हुए। पर हमारी माँ दूसरी माओं से अलग थी, उसने हमें उड़ना नहीं सिखाया, और कभी घोंसले से बहार भी नहीं जाने दिया। वो बहार जाती और हमारे लिए खाना लाती। जब तक माँ साथ रहती हम बहुत खुश रहते, वो हमें नयी नयी  कहानियां सुनाती,  बाहर के लोगों के बारे में बताती, पर जब माँ  चली जाती तो हम ऊबने लगते, पर बाहर नहीं झांकते, क्योंकि माँ ने एक बार  बड़े कौए की कहानी सुनाई थी जो चिड़िया के छोटे बच्चों को निगल जाता है। पर फिर भी हम थे बहुत शैतान, अपनी बोरियत भगाने के लिए नयी नयी कारस्तानियाँ करते, चोंच से चोंच लड़ाते, घोंसले में ही उड़ने की एक्टिंग करते माँ की  सुनाई कहानियों के characters की नक़ल भी करते। ऐसे ही हमें एक दिन एक नयी कारस्तानी सूझी हमने घोंसले के अंदर के ही तिनके बटोरना शुरू किया और घोंसले के अंदर एक छोटा सा घोंसला बना लिया जो बहुत अच्छा बन गया। हमें लगा की हमने माँ से भी अच्छा घोंसला बनाया है, हम बहुत खुश हुए माँ ने  हमारे घोंसले की बहुत तारीफ की और ये भी कहा कि ये दुनिया का सबसे अच्छा घोंसला है। 

                       और फिर एक दिन माँ मर गयी। हम बहुत रोये। पर कब तक रोते, तो हम चुप हो गए। दुसरे दिन दोपहर भी आधी जा चुकी थी हम सब भूख के मारे बिलबिलाने लगे। फिर सबने मिल के फैसला किया की हम बहार जाएँगे और खाना ढूढेंगे। पर कैसे??बाहर वो काला कौआ जो है, और अगर उससे बच  भी गए तो भी कैसे जाएँगे, उड़ना तो हमें आता नहीं है । ये सोचा, और दोपहर भी जाती रही। शाम होने तक लगा की घोंसले में ही दम तोड़ देंगे, सबसे छोटे वाले भाई ने बोला की घोंसले में मरने से अच्छा है कि बहार जाकर मर जाएं, तब जाके सबकी हिम्मत फिर एकजुट हुई और हमने घोंसले से बाहर छलांग लगा दी, ये तो जादू था, सबके पर सन्न से तन गए, हवा में तैरते हुए हम सब नदी किनारे पहुँच  गए, माँ ने नदी के बारे में बताया था अपनी कहानियों  में, और ये भी कहा था कि कुछ बड़े - बड़े दूसरी प्रजाति की बिना पंख वाले चिडे भी वहां रहते हैं, जो हम जैसे छोटे चिड़ियों के लिए सफ़ेद दाने जैसे माँ हमारे लिए चुन कर लाया करती थी, मिटटी पर डाल देते हैं, हमें वो दाने दिखे उस घोंसले के पास जो हमारे घोंसले से बहुत बहुत बड़ा था और वो दिखने में भी थोडा अलग था। हम सब  उन  दानों पर फ़ुदक पड़े। हमने जम कर दाने खाये। सबका पेट भर गया था। सब ख़ुशी से  चिचक  चिचक  फुदक रहे थे। फिर अँधेरा होने लगा, सबका डर थोडा बढ़ने लगा, घोंसले की तरफ लौट पड़े, रास्ते में कोई किसी से कुछ न बोला, घोंसले पर पहुँच कर भी बहुत शांति थी, शायद सब यही सोच रहे थे, की माँ ने तो कहा था की हवा छोटे बचों को उड़ा के ले जाती है, वैसी हवा क्यों नहीं मिली, और वो कला कौआ वो  कहाँ  छिप गया था, और तो और रास्ते में हमने बाया पक्षी का घोंसला भी देखा जो शायद दुनिया का सबसे सुंदर घोंसला था, सबसे ज्यादा तरतीब से बनाया हुआ, उसे देख के हमें अपने बनाये हुए घोंसले पर शर्म आ गयी  , और हम सोचने लगे कि  माँ ने क्यों कहा था कि हमारा घोंसला दुनिया का सबसे सुन्दर घोंसला है।

                         आज माँ को गए पूरे दो साल हो गए हैं, हम सारे भाई बहन अपने अपने बच्चों के साथ अपने अपने घोंसलों में रहते हैं।  हम सबने अपने बच्चों को थोडा बड़े होते ही उड़ना सिख दिया। मेरा एक पंख ख़राब हो गया है इसलिए मै ज्यादा  उड़ नहीं पाता। बच्चे दिन भर बहार रहते हैं और मै अकेले घोंसले में। 

अब जाकर मुझे समझ आया की माँ ने हमें उड़ना क्यों नहीं सिखाया। .............
                                                                                                                           





                 .................................................





Sunday, May 5, 2013


GhantiyaN bajti haiN, jeene par kadam ki chaap hai.
phir koi bechehra hoga,
munh me hogi jiske makkhan ki jubaN..
seene me hoga jiske ek patthar ka dil,
muskurakar mere dil ka ek barak le jaega...

NIDA FAZLI


(Ya le gaya, ek aur barak meri khwahishoN ka, mere dil se chura ke..yah ruh se kharoch ke..)

ज़ख्म खाने में मज़ा जिसको बहुत आता है..
वो ही पागल, फिर मसीहा यहाँ कहलाता है ..

ये अजब सा हुनर उसने सीखा है "फराग"..
खंज़र पसलियों तक जाकर ज़रा सहलाता है ..


JEENGAR ANIL (EK ANYA KAVI)

मेरे पैदा होने पर


जिस दिन वसुंधरा के किसी आँगन में

 मैंने कदम रखा होगा
आँगन उस हरे भरे प्यारे वृछ की तरह
 प्रतीत होता होगा
जिसमे गृह निवासी पुष्पों की भांति
खिले हुए चाँद लेकर,
आँगन को अपनी चांदनी से परिपूर्ण कर रहे होंगे
भ्रमर भांति अतिथि घर के
इधर उधर डोल रहे होंगे
अपने मन में आशा लिए देखने की मुझको
भ्रमर डोलता है जिस प्रकार
देख पुष्प की सुन्दरता को मोहित हो
वे सभी जानते हैं मुझको
क्या मै जानता हूँ उनको ?
क्यों इस प्रकार सुन्दर वन जैसा
प्रतीत होने लगा आँगन मेरा
कहीं सावन तो नहीं नाम मेरा
हाँ हाँ इसी प्रकार तो सावन के आते ही
मिट जाता है पतझड़ का अँधेरा
किन्तु इससे पहले कहाँ था मेरा बसेरा??
शायद मुझे मौसम की रानी ने है  भेजा
और कहा हो की थोड़ी हरियाली
 इस सूखे वृछ के लिए भी ले जा
पुनः मै जाऊंगा कहाँ
मैंने अभी तक नहीं सोंचा
जानता हूँ, मौसम की रानी ने है भेजा
वही कहीं और जाने केलिए भेजेगी फिर संदेसा
दो पल की ख़ुशी हूँ मै
मुझे जाना होगा
दुःख मत करना मुझे जाना होगा
ख़ुशी लेकर आया था
दुखों में छोड़ कर जाना होगा
खुश रहना  मै फिर आऊंगा



अंकिता गुप्ता 

बचपन की लिखाई  से…

1990 pageviews1940 pageviews

1582


15021493  1434

1051 page vieves

1083
1202
1204
1207
1229
1242
1358
 1403 pageviews aaj ke ajj

Pageview chart 1434 pageviews - 81 posts, last published on Jun 11, 2013 - 6 followers




15   






Monday, February 4, 2013


stories for script

1. the bet
2. the girl sees a woman who eats men...
3. one sister kills a man whom her sister loves...gaaon ka area
4. ladki bhesh badal ke kahaniyaN chapwaati hai


http://listverse.com/search/?q=indian+short+story+writers&sa=Search
http://www.guardian.co.uk/books/2011/dec/11/writers-pick-favourite-short-stories

http://www.youtube.com/watch?v=l5s3_XV1rkA&list=PL25F51B1F99E30E00

http://content.metasys.com.br/files/dominiopublico.gov.br/gid-9990/ps000001.pdf  The dreams people see

No comments:


Post a Comment















 1838 pageviews - 84 posts, last published on Jul 2, 2013 
Preview
Preview

Wednesday, May 1, 2013





 काली छोटी पिपीलिकाओं  को देखते रहना आदत बन गयी थी मेरी, पिपीलिका मतलब चींटी.
 वो चुपचाप चलती जा रही थी , रास्ते में एक बड़ा सा ब्रेड का टुकड़ा पड़ा होगा उससे दुगुना, पूरे दम से खींचने में लगी थी, पर खिंच नहीं पाई तो अपनी बड़ी बहन को बुला लिया, फिर दोनों ने मिलकर उस टुकड़े को खींचा और अपने घर ले गयीं..

Monday, March 25, 2013

झोला


ये मेरा झोला है, भूरे रंग का कपडे का बना हुआ

थोडा फटा भी है
पर ये ही झोला मेरा क्यों है??
और ये उनका झोला है,  काले रंग का प्योर leather का बना हुआ
पर ये ही झोला उनका क्यों है

उन्होंने मुझसे

ये सवाल किया
उनके सवाल पूछने
का अभिप्राय कुछ और था
पर मैंने जवाब कुछ और ही खोज
निकाला......!!!!!
  


राजुल से बात करते हुए 

(F T I I )





Monday, February 4, 2013

THE FUNNIEST DREAM EVEH!!!READ IT!!!!

THE FUNNIEST DREAM EVEH!!!!! READ IT!!!!

by ~Haley :)~
in

May 11th, 2011 So I had this really crazy, and funny dream last night. Here it is:

It started out as me in my house, but it did not look like my house at all, but I knew it was. And there was a bunch of people I knew in my dream, but I don't know them in real life. So there was this lady with blonde hair that was sitting in a chair, and my dog started sniffing her dog. So I said, “can I take your dog to the dog park with my dog to have a race?” And she said, “sure!”
And I was like, “Where's the leash?” and she told me it was in the kitchen. So I walked in there, and there was this Chinese chef guy, that I knew in my dream, but I don't know him in real life. And there was these mice that kept trying to come through this little cupboard. And so he screamed, “GET OUT!” to the mice. And they ran away. And we both started laughing really hard. And I was like, “dude, that was epic!” And we high-fived. Then this bald, fat dude came in, and we screamed, “GET OUT!,” at the top of our lungs. And he looked at us like we were phys-co. Then we laughed so hard 'till we were rolling on the ground. And then we slapped his tummy super hard. Then I looked down and saw the leash, and I got the dog, and took them to the dog park. And then I woke up.  

Thursday, January 31, 2013

Dybbuk

In Jewish mythology, a dybbuk from Hebrew  is a malicious or malevolent possessing spirit believed to be the dislocated soul of a dead person.

ye chakkar pura ho raha hai ab,,,,

Tuesday, January 29, 2013

I just want to have myself again, I want to start painting right away.....

http://www.eldritchpress.org/ac/jr/garnett.htm
http://www.womenunlimited.net/default.htm
http://litreactor.com/columns/storyville-top-ten-best-short-stories-ever

Friday, January 25, 2013

खून की बात

ये मेरे शब्द हैं
जिन्हें मैंने बनाया नहीं है
कोई कील ठोक के मजबूत नहीं किया है
ये मेरे खून में बहते हैं
खून का बहाव तेज होता है तो
काग़ज़ पर टपकने लगते हैं

 "सच ये मेरे खून में बहते हैं "

मै दर्द पाने के लिए
और खून बहाने के लिए
शरीर का कोई हिस्सा काटती नहीं हूँ
दर्द होता है तो हिस्सा कट जाता है
हिस्सा कट जाता है तो दर्द होता है

और फिर खून टपकने लगता है
खुद ब खुद
कागज़ लाल हो जाता है
कभी नीला भी, और कभी स्याह भी
कागज़ पर रंग तो चढ़ ही जाता है
पर ये रंग बहुत बेतरतीब होता है

शायद ये खून कभी तरतीबी से टपकेगा
पर तब भी
इसमें कोई कील लगाने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी
क्यों की ये खून मेरा है
क्योंकि ये खून "मेरे" शब्दों का है


पर सच कहूँ तो मुझे ये बेतरतीब  लाल नीला स्याह खून आज भी बहुत पसंद है
क्यों की ये मेरा है।

पर ये इमरोज़ कौन है??

AAJ MAI ROI

http://amritapritamhindi.blogspot.in/2008/06/blog-post_23.html

 अमृता तो हीर है,और फकीर भी
इमरोज़ अमृता को कई नामों से बुलाते थे उस में एक नाम था "बरकते "बरकते यानी बरकत वाली अच्छी किस्मत वाली सम्पन्न भरपूर.... वह कहते हैं कि बरकत तो उसके हाथ में है , उसके लेखन में है ....उसके होने में है ,उसके पूरे वजूद में है ..अमृता तो हीर है
और फकीर भी
तख्त हजारे उसका धर्म है
और प्यार
उसकी ज़िंदगी
जाति से वह भिक्षु है
और मिजाज़ से
एक अमीर
वह एक हाथ से कमाती है
तो
दूसरे हाथ से बांटती है


इमरोज़ और अमृता के मिजाज़ और पसन्द मिलती जुलती भी है और अलग भी है ! वह दोनों अलग कमरे में रहते थे .अमृता बहुत सवेरे काम करती थी जब इमरोज़ सोये हुए होते थे और इमरोज़ उस वक्त काम करते थे जब अमृता सोयी होती थी .दोनों के जीवन कर्म अलग अलग थे लेकिन स्वभाव एक से थे !न वह पार्टी में जाते थे न घर में इस प्रकार का कोई आयोजन होता था दोनों अपने साथ ही वक्त गुजारना पसंद करते थे, अलग अलग अकेले अपने साथ अमृता अपने लेखन में ,इमरोज़ अपनी पेंटिंग्स में ....दोनों के कमरे के दरवाज़े खुले रहते ताकि एक दूसरे की खुशबु आती रहे लेकिन एक दूसरे के काम में कोई दखल अंदाजी नही ....जब अमृता लिख रही होती तो इमरोज़ चुपचाप उसके कमरे में जा के उनकी मेज पर चाय का कप रख आते !पर जब अमृता के बच्चे कुछ मांगते तो अपना लिखना बीच में छोड़ के वह उनका कहा पूरा करती !


अमृता कवितायें बनाती नही थी वह केवल अपने जज्बात से कविता कागज पर उतार देती एक बार लिखने के बाद न तो उन्हें काटती न कुछ उस में बदलती थी जो जहन में आता वह उसको वैसा ही लिख देती !!
एक बार की बात इमरोज़ जी ने मुझे बताई की वह किसी काम से मुम्बई गए थे ....ख़त आदि का सिलसिला उनके और अमृता के बीच में चलता रहा ..ऐसे ही एक ख़त में अमृता ने उन्हें लिखा
जीती !!
तुम जितनी सब्जी दे के गए थे ,वह ख़त्म हो गई है !जितने फल लेकर दे गए थे वह भी ख़त्म हो गए हैं फिरज खाली पड़ा है ..मेरी ज़िंदगी भी खाली होती हुई सी लग रही है - तुम जितनी साँसे छोड़ गए थे ,वह खत्म हो रहीं है ....
दस्तावेज ;अमृता प्रीतम के ख़त ]

इमरोज़ अमृता से कई साल छोटे थे पर कभी उम्र उनके प्यार में नही आई ,दोनों अलग शख्सियत थे पर एक दूजे को दिल से चाहा !! क्या इस लिए कहते हैं कि विपरीत परस्पर एक दुसरे को आकर्षित करते हैं ? क्या प्यार इन्ही दो उलट लोगो के बीच की कशिश होती है !!
 

वह
हर कोई कह रहा है
कि वह नही रही
मैं कहता हूँ
वह है
कोई सबूत?
मैं हूँ
अगर वह न होती
तो मैं भी न होता ....
इमरोज़


mai hamesha se aisa hi pyaar chahti thi apne liye, shayad sab aisa hi chate honge,
per aaj mai royi, maine us aurat ki shiddat ko mahsoos kiya, aur uske chanewaale IMROZ ki shiddat ko bhi mahsoos kiya, aur un dono ke alag alag dard ko bhi mahsoos kiya,
shayad bahut kam, shayad bilkul nahi, per aaj mai royi...

Tuesday, January 22, 2013

http://irresistibletargets.blogspot.in/

Saturday, January 5, 2013

Vibhu Puri Sau Gram Zindagi




Movie: Guzaarish
Song Name: Sau Gram Zindagi lyrics
Singers: Kunal Ganjawala
Lyrics: Vibhu Puri
Music Director: Sanjay Leela Bhansali


thodi si meethi hai zara si mirchi hai
sau gram zindagi yeh sambhaal ke kharchi hai
asli hai, jhooti hai khaalish hai, farzi hai
sau gram zindagi yeh sau gram zindagi yeh
sambhaal ke kharchi hai thodi si meethi hai
zara si mirchi hai

der tak ubaali hai cup mein daali hai
kadvi hai naseeb si yeh coffee gaadhi gaadhi hai
chamach bhar cheeni ho itni si marzi hai
sau gram zindagi yeh sau gram zindagi yeh
sambhaal ke kharchi hai

khari hai, khoti hai rone ko chhoti hai
dhaagey se khushiyon ko seelti hai, darzi hai
sau gram zindagi yeh sau gram zindagi yeh
sambhaal ke kharchi hai thodi si meethi hai
zara si mirchi hai
life is good life is wonderful
life is pain oh yeah yeah yeah
life is good, life is good
life is wonderful, wonderful
life is pain it all part of that game
life is love it all good that' s the way

sau gram zindagi yeh - 4
Aaj maine do scripts likhe short films ke. aur mujhe dono hi achhe lag rahe haiN....:)

Cheers To me.................:)

ये मै हूँ

देखो भाषा तो एक ही है, और सीमित 
उसमे ही विचरण करना है 
उसमे ही घूमते रहना है
उसमे से ही कुछ पत्तियां तोड़ के लानी है 

ये पत्तियां हरी भी हो सकती हैं 
और पीली भी 
और ये पत्तियां सूखी भी हो सकती हैं 

बात सिर्फ इतनी सी है 
कि तुम्हे इन पत्तियों में ही 
थोड़ी सी अपनी महक मिलनी है ..............................

रूम मेट


मुझे अच्छा लगा आज तुम्हे चहकता देख कर 
तुम पहले जैसी दिख रही हो।।
मै जानती हूँ कि  अन्दर बहुत दर्द है 
और शायद मैं उसे  समझती भी हूँ 
पर मै उसे नासमझने का दिखावा करती हूँ 
और मै ये दिखावा करती  रहूंगी 
क्यों कि मै बहुत मतलबी हूँ 
मुझे पता है की पिछली बार जब तुम्हे चोट लगी थी 
तो मुझे बहुत दर्द हुआ था 
तुम्हारा घाव भर गया था, लेकिन मै करहाती रही 
तुम नाली में जा गिरी थीं 
तुम्हारा पूरा  शरीर  छिल गया था।।


तुम बच्चों सी ज़िद करके मेरे मना करने  बावजूद  
हम सबके मना करने के बावजूद 
 फिर उसी  नाली के पास जा रही हो 
क्यों की उस नाली में तुम्हे अपनी तैरती हुई नाव 
बहुत ख़ूबसूरत दिखाई देती है 
तुम समझ नहीं पा रही हो कि नाव कागज़ की है 
कुछ दूर चलने के बाद गल जाएगी 
और नाली में बहुत फिसलन है 
तुम नाव के पीछे भागते भागते फिर गिर जाओगी 
और फिर चोट लगेगी तुम्हे तुम्हारे शरीर पर 
तुम्हारे मन पर भी 
शायद मेरे मन पर भी 
इसलिए बार - बार मै खुद से कहती रहती हूँ 
कि तुम्हारे दर्द से मेरा कोई रिश्ता नहीं 
क्योंकि  मै बहुत मतलबी हूँ ।।।।।
    





तुम्हारी याद में

तुम्हारे  अन्दर से  कितनी कहानियां निकलती हैं हर रोज़,
पर मै उन्हें लिख नहीं पाती।
क्यों की लिखते- लिखते कलम गीली हो जाती है और स्याही  बहने लगती है 
आज सुबह से मैंने कितनी कोशिश की कि इस बहती हुई स्याही को
तुम्हारी सफ़ेद शर्ट तक पहुँचने न दूँ 
पर ये बहुत ज़िद्दी  है 
मेरी  उँगलियों  को काला  करते हुए अपना रास्ता  बना कर निकल गयी 
और मै यहाँ तुम्हारी शर्ट पर लगे दाग को देख कर पछता रही हूँ!!!