जब भी मैने उड़ना चाहा, तो मेरे पंखों मे छेद कर रस्सियां बांध दीं
और बरगद के पेड़ के नीचे लटका दिया।
और अब तुम रोती रहती हो सुबह और रात,
मैं डाल पर बैठ कर नमक की बूँदों की आवाज़ सुनता हूँ।
मैं उड़ जाऊं अभी, और तुम्हारा संदेस उस तक पहुंचा दूं,
ग़र रस्सियों की ढील पर तुम्हारा काबू न हो तो।
तुम चाहती तो हो की मैं उड़ जाऊं,
पर रस्सियां कभी ढीली क्यों नहीं छोडतीं।