google +

Search results

Sunday, December 23, 2012

लबादा

अब समय आ गया है की  मै अपने दुखों के पुराने - चीथड़े लबादे में पाबंद लगाना बंद करूँ और उसे उतार फेंकूं
और उसकी छोटी से छोटी तह बनाकर थोड़ी मिट्टी खोद कर उसे दफना दूँ। क्यों की मै नही चाहती की तुमसे निकलने वाली धूप की कोई भी लपट
इस लबादे के छेद से या फटी हुई सीवन से अन्दर घुस कर मुझे जला  दे।।। क्यों की अब मै तुमसे जलना नहीं चाहती।।

लेकिन उससे पहले मै तुम्हे एक बार ये लबादा दिखाना चाहती हूँ, और तुम्हे ये बताना चाहती हूँ कि देखो इस लबादे को उतार फेंकना इतना आसन नहीं था
क्यों की ये हमेशा से चीथड़ा नहीं था, ये मजबूत और न फटने वाले दुखों के कपडे से बना था, और ना टूटने वाले यादों के धागे से सिला था,
जिसे चीथड़ा बनाने में सालों लिए हैं मैंने, या यूँ कहो की सालों दिए है मैंने, पर खैर दफ़्नाऊन ना अगर इसे तो आखिरी ख्वाहिश है की तुम्हे पहना दूँ ये लबादा
और चारों तरफ से सुलगा दूँ आग जो तुम्हारे सूरज से ज्यादा हो।।।।।।।।।।।।।



March15/ 2010
 



No comments:

Post a Comment