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Friday, January 25, 2013

खून की बात

ये मेरे शब्द हैं
जिन्हें मैंने बनाया नहीं है
कोई कील ठोक के मजबूत नहीं किया है
ये मेरे खून में बहते हैं
खून का बहाव तेज होता है तो
काग़ज़ पर टपकने लगते हैं

 "सच ये मेरे खून में बहते हैं "

मै दर्द पाने के लिए
और खून बहाने के लिए
शरीर का कोई हिस्सा काटती नहीं हूँ
दर्द होता है तो हिस्सा कट जाता है
हिस्सा कट जाता है तो दर्द होता है

और फिर खून टपकने लगता है
खुद ब खुद
कागज़ लाल हो जाता है
कभी नीला भी, और कभी स्याह भी
कागज़ पर रंग तो चढ़ ही जाता है
पर ये रंग बहुत बेतरतीब होता है

शायद ये खून कभी तरतीबी से टपकेगा
पर तब भी
इसमें कोई कील लगाने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी
क्यों की ये खून मेरा है
क्योंकि ये खून "मेरे" शब्दों का है


पर सच कहूँ तो मुझे ये बेतरतीब  लाल नीला स्याह खून आज भी बहुत पसंद है
क्यों की ये मेरा है।

1 comment:

  1. आज मैंने अमृता को पढ़ा उन्होंने भी अपने खून में कभी कील नहीं ठोकी थी।

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