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Saturday, January 5, 2013

रूम मेट


मुझे अच्छा लगा आज तुम्हे चहकता देख कर 
तुम पहले जैसी दिख रही हो।।
मै जानती हूँ कि  अन्दर बहुत दर्द है 
और शायद मैं उसे  समझती भी हूँ 
पर मै उसे नासमझने का दिखावा करती हूँ 
और मै ये दिखावा करती  रहूंगी 
क्यों कि मै बहुत मतलबी हूँ 
मुझे पता है की पिछली बार जब तुम्हे चोट लगी थी 
तो मुझे बहुत दर्द हुआ था 
तुम्हारा घाव भर गया था, लेकिन मै करहाती रही 
तुम नाली में जा गिरी थीं 
तुम्हारा पूरा  शरीर  छिल गया था।।


तुम बच्चों सी ज़िद करके मेरे मना करने  बावजूद  
हम सबके मना करने के बावजूद 
 फिर उसी  नाली के पास जा रही हो 
क्यों की उस नाली में तुम्हे अपनी तैरती हुई नाव 
बहुत ख़ूबसूरत दिखाई देती है 
तुम समझ नहीं पा रही हो कि नाव कागज़ की है 
कुछ दूर चलने के बाद गल जाएगी 
और नाली में बहुत फिसलन है 
तुम नाव के पीछे भागते भागते फिर गिर जाओगी 
और फिर चोट लगेगी तुम्हे तुम्हारे शरीर पर 
तुम्हारे मन पर भी 
शायद मेरे मन पर भी 
इसलिए बार - बार मै खुद से कहती रहती हूँ 
कि तुम्हारे दर्द से मेरा कोई रिश्ता नहीं 
क्योंकि  मै बहुत मतलबी हूँ ।।।।।
    





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