जिस दिन वसुंधरा के किसी आँगन में
मैंने कदम रखा होगा
आँगन उस हरे भरे प्यारे वृछ की तरह
प्रतीत होता होगा
जिसमे गृह निवासी पुष्पों की भांति
खिले हुए चाँद लेकर,
आँगन को अपनी चांदनी से परिपूर्ण कर रहे होंगे
भ्रमर भांति अतिथि घर के
इधर उधर डोल रहे होंगे
अपने मन में आशा लिए देखने की मुझको
भ्रमर डोलता है जिस प्रकार
देख पुष्प की सुन्दरता को मोहित हो
वे सभी जानते हैं मुझको
क्या मै जानता हूँ उनको ?
क्यों इस प्रकार सुन्दर वन जैसा
प्रतीत होने लगा आँगन मेरा
कहीं सावन तो नहीं नाम मेरा
हाँ हाँ इसी प्रकार तो सावन के आते ही
मिट जाता है पतझड़ का अँधेरा
किन्तु इससे पहले कहाँ था मेरा बसेरा??
शायद मुझे मौसम की रानी ने है भेजा
और कहा हो की थोड़ी हरियाली
इस सूखे वृछ के लिए भी ले जा
पुनः मै जाऊंगा कहाँ
मैंने अभी तक नहीं सोंचा
जानता हूँ, मौसम की रानी ने है भेजा
वही कहीं और जाने केलिए भेजेगी फिर संदेसा
दो पल की ख़ुशी हूँ मै
मुझे जाना होगा
दुःख मत करना मुझे जाना होगा
ख़ुशी लेकर आया था
दुखों में छोड़ कर जाना होगा
खुश रहना मै फिर आऊंगा
अंकिता गुप्ता
बचपन की लिखाई से…

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