part1
दस फुट लंबा और छ: फुट चौड़ा लकड़ी का नक्काशीदार और कामदार दरवाजा खोल कर, सायं - सायं करती रात में उसने विशाल राजमहल सी दिखने वाली हवेली में प्रवेश किया ......अन्दर चरों तरफ न जाने कितनी बत्तियां जल रही थीं... उसके घुंघराले बाल मुंह को ढकते हुए कंधे पैर फनफना रहे थे .....गोरा शारीर गोल चेहरा और मोटा काजल लगी हुई बड़ी -बड़ी आँखें चौड़े घेर वाला लम्बा घाघरा लिथराते हुए वो पथराई सी आगे बढती जा रही थी...........शायद ये राजमहल का आगंतुक कक्ष था .....कक्ष में करीब पच्चीस फुट आगे बढ़ने पैर सामने वाली दीवार पर सुनहरे फ्रेम में मधि एक आदमकद तस्वीर टंगी थी ..जो किसी महारानी जैसी दिखने वाली प्रभावशाली महिला की थी... उस तस्वीर वाली दीवार से सटी एक मेज राखी थी .....जिसके बीचों बिच में एक चंडी की प्लेट में सोने का मुकुट रखा था........
उसने उस मुकुट को हाथ में ले लिया,कुछ देर बुरे सी देखती रही फिर अचानक दर के मरे एक चींख के साथ ज़मीं पैर छोड़ दिया,,,और अपने दोनों हाथों को कानो पैर रख लिया ........फिर वो चुपचाप मेज के एक पाँव के सहारे अपने घुटने पकड़ कर बैठ गयी ..उसी समय कमरे के चरों और से कुछ लोगों के चिल्लाने की अजीब अजीब आवाजें आने लगीं .......आवाजें सुनकर उसका सर फटने लगा ......घबराहट में उसने अपनी उँगलियों को दांतों से भीच लिया ........फिर कुछ समाज नहीं आया तो अपने सर को घुटनों पैर मारने लगी ....तभी तस्वीर वाली दीवार की और से एक तल्ख़ आवाज़ आई ....."भाग जा " ........वो बेचैनी से उठकर बदहवास सी इधर उधर भागने लगी ........उस आवाज़ से अपनी आवाज़ मिलाती हुई "भाग जा - भाग जा"........ .भागती भागती वो तस्वीर वाली दीवार के पास पहुँच गयी.......ज़मीं में पड़े हुए मुकुट को फिर से उठाया और पहन लिया उसने मुकुट को कई बार पहने उतरा , कई बार तस्वीर के शीशे में अपना अक्स देखा और खुश हुई ......फिर हंसती हुई मुकुट को पहने पहने ही दोनों बाजुएँ फैलाये गोल - गोल घुमती रही.......दस मिनट, पंद्रह मिनट, आधा घंटा , फिर पता नहीं कब तक बस घूमती ही रही.......कभी हंसती कभी चिल्लाती, कभी अपने अक्स शीशे में देखती फिर चिल्लाती , पता नहीं कितने घंटो बाद वो थक कर चूर हो गयी और धम्म से वहीँ गिर पड़ी और पड़े- पड़े सो भी गयी शायद....
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ReplyDeleteplz ignore the spelling and punctuation mistakes.....will edit dem afterwards
ReplyDeletehmmmmm.....
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