इंसान जादातर समय परेशां रहता है, और डरता रहता है... क्यों क़ि वो अपने आप को स्वीकार नहीं कर पाता. लेकिन जिस दिन वो अपने आप को जैसा वो है वैसे ही स्वीकार करना सीख जाता है सारी अनियामितातायें, confusion, lack of confidence , सब एक साथ दूर हो जाते हैं, सिकुड़ी हुई सीमाओं में फंसी हुई ज़िन्दगी निर्भीकता और आत्मा संयोजन के खुले मैदान में आ जाती है जहाँ उसकी सोच- विचार दूर दूर तक टहलने के लिए स्वतंत्र होते हैं, वो टहलते हैं, और खुश होते हैं, उसी दौरान गाना सिख जाते हैं, नाचना सिख जाते हैं, उछालते हैं कूदते हैं और ठिठोलिया करते हैं, नीले आस्मां को निहारते हैं और जोर से हँसते हैं, खुले मैदान में जहाँ कोई पगडण्डी नहीं, दूर दूर तक मैदान ही मैदान है वहां वो अपना रास्ता धुंध निकलते हैं और आगे बढ़नेलगते हैं. लेकिन हाँ अगर इस दौरान वो मतवाले नहीं हुए और अपनी पहचान भूल न गए तो मंजिल तक पहुँच जाते हैं......लेकिन अगर इसका opposit हुआ तो वो वो उसी मैदान के गोल्धारे में घूमते रह जाते हैं......so moral of the story ........."क़ि यदि सचमुच कुछ पाना कहते हो तो अपने आप को एक्सेप्ट करना सीखना होगा अपनी कमियों और अपनी मजबूतियों के साथ"
Hi ,
ReplyDeletenice thoughts that u penned down. a very girly pink color u have put up ur blog in :-)