तब जब सब समझ में आता था
या नहीं आता था
तब शांत रहती थी
और महसूस करती थी
वो था मेरा बचपन
अब यहाँ से वहां छलांगे मारती हूँ
उछलती हूँ
हंसती हूँ
खिलखिलाती हूँ
मुस्कुराती हूँ
और आगे निकल जाती हूँ
पर कुछ समझ नहीं आता
या नहीं आता था
तब शांत रहती थी
और महसूस करती थी
वो था मेरा बचपन
अब यहाँ से वहां छलांगे मारती हूँ
उछलती हूँ
हंसती हूँ
खिलखिलाती हूँ
मुस्कुराती हूँ
और आगे निकल जाती हूँ
पर कुछ समझ नहीं आता
यह कविता पढ़कर मुझे बचपन की मासूमियत और अब की उलझन दोनों साफ महसूस हुई। बचपन की शांति और समझदारी की कमी, और अब की तेजी, उछल-कूद, हंसी-मुस्कान में भी समझ न आने की उलझन, सब कुछ बहुत जीवंत लग रहा है।
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