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Tuesday, July 6, 2010

माँ- पिता जी

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उम्र दराज़ शजरों  की
झुकी हुई डालियों पर,
बेपरवाह उछलकूद मचा रहे
हैं हम...
सहारा दें की सीधा कर दें उन्हें,
हरी पत्तियों से इक बार
फिर भर दें उन्हें,
पर उनके अह्सासे जख्मों पर रेत मसले जा रहे हैं...
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(Ankita)

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